❣️ मेरा पहला पहला प्यार ❣️
💞 मेरा पहला-पहला प्यार ❣️
पहला प्यार… ये शब्द सुनते ही दिल के किसी कोने में दबी हुई पुरानी यादें दस्तक देने लगती हैं। शायद हर किसी की ज़िंदगी में पहला प्यार ऐसा ही होता है—अनजाना, मासूम, भोला और इतना गहरा कि उसकी छाप कभी मिट नहीं पाती।
ये कहानी है आरव और सृष्टि की।
1. मासूम मुलाक़ात
आरव गाँव का सीधा-साधा लड़का था। आँखों में सपने और दिल में एक अजीब-सी सच्चाई। पढ़ाई में अच्छा था और माँ-बाप का सहारा भी। बारहवीं पास करने के बाद जब शहर कॉलेज जाने का मौका मिला, तो उसके जीवन में नई शुरुआत हुई।
वहीं उसकी नज़र पहली बार सृष्टि पर पड़ी। वो सफेद सलवार-सूट पहने, बालों की चोटी झुलाती हुई कॉलेज के गेट से अंदर आई थी। उसकी आँखों में मासूमियत थी और चेहरे पर एक अजीब-सी चमक। आरव की नज़र जैसे वहीं ठहर गई।
दिल ने धीरे से कहा—
"शायद यही है मेरा पहला प्यार।"
2. अनकहा रिश्ता
आरव और सृष्टि एक ही क्लास में थे। शुरुआत में बस हल्की-फुल्की नज़रें मिलतीं, लेकिन धीरे-धीरे दोनों की आँखों ने बात करना सीख लिया। क्लास में बैठते हुए, नोट्स लेते हुए या लाइब्रेरी में किताब ढूँढते हुए, जब भी नज़रें मिलतीं, दोनों के गाल लाल हो जाते।
आरव को कभी हिम्मत नहीं हुई कि वो सीधे जाकर सृष्टि से बात कर सके। बस किताबों में छिपकर उसे देखते रहना, यही उसकी आदत बन गई थी।
सृष्टि भी उसकी खामोशी को महसूस करती थी। कई बार वो मुस्कुराकर आरव की ओर देखती और फिर झट से नज़रें झुका लेती। उस मुस्कान में जो सुकून था, वो आरव के लिए पूरी दुनिया से बढ़कर था।
3. दिल की धड़कनें
एक दिन लाइब्रेरी में दोनों अकेले थे। बाहर बारिश हो रही थी। खिड़की से आती बूंदों की टप-टप और अंदर फैली खामोशी में आरव ने पहली बार हिम्मत जुटाई।
धीरे से बोला,
“तुम्हें बारिश अच्छी लगती है?”
सृष्टि ने किताब से सिर उठाया और मुस्कुरा दी—
“हाँ… बारिश तो मुझे बहुत पसंद है। पर अकेले देखना उतना अच्छा नहीं लगता।”
उसके ये शब्द आरव के दिल में गूंजते रहे। उसी दिन से दोनों की बातें शुरू हो गईं। पहले किताबों से, फिर क्लास के किस्सों से और फिर धीरे-धीरे एक-दूसरे की ज़िंदगी से।
4. पहली चाहत
वक़्त गुजरता गया और दोनों की दोस्ती अब गहरी चाहत में बदलने लगी। कॉलेज के बाद साथ-साथ घर जाना, कैंटीन में चाय साझा करना, और नर्मदा किनारे बैठकर सपनों की बातें करना—ये सब उनकी दुनिया का हिस्सा बन चुका था।
आरव अक्सर कहता,
“काश ये पल यहीं रुक जाएँ… न तुम्हें जाने की जल्दी हो, न मुझे।”
सृष्टि उसकी आँखों में देखकर बस मुस्कुरा देती।
5. अनकहा इज़हार
आरव बार-बार सोचता कि सृष्टि से अपने दिल की बात कहे, लेकिन हर बार उसकी खामोशी भारी पड़ जाती। उसे डर था कि कहीं ये रिश्ता टूट न जाए।
एक दिन सृष्टि बोली,
“आरव, अगर मैं तुम्हारे साथ हमेशा रहना चाहूँ तो?”
आरव का दिल जैसे धड़कना भूल गया।
उसने कांपती आवाज़ में कहा—
“सृष्टि… तुम जानती हो, तुम मेरे लिए क्या हो। लेकिन…”
“लेकिन क्या?” सृष्टि ने आँखों में आँसू भरकर पूछा।
आरव चुप रहा। उसके परिवार की ज़िम्मेदारियाँ, समाज की सोच और उनके बीच का फर्क… ये सब उसे रोक रहा था।
6. जुदाई की दस्तक
कॉलेज का आख़िरी साल खत्म होने वाला था। दोनों को पता था कि अब ज़िंदगी उन्हें अलग-अलग रास्तों पर ले जाएगी।
सृष्टि के पिता ने उसकी शादी तय कर दी थी। जब उसने ये बात आरव को बताई तो उसकी आँखें भीग गईं।
“आरव, मैं चाहकर भी तुम्हें नहीं पा सकूँगी। पर ये दिल हमेशा तुम्हारा रहेगा।”
आरव ने उसकी हथेलियाँ थामकर कहा—
“पहला प्यार कभी खत्म नहीं होता सृष्टि। चाहे तुम दूर रहो, पर मेरी दुआएँ हमेशा तुम्हारे साथ रहेंगी।”
उस दिन नर्मदा किनारे दोनों ने घंटों चुपचाप बैठकर रोया।
7. अधूरा लेकिन अमर
सृष्टि की शादी हो गई। आरव ने उसकी खुशियों के लिए खुद को चुप कर लिया। उसने अपने आँसुओं को किताबों में छुपाया और परिवार की जिम्मेदारियों में खुद को डुबो दिया।
लेकिन हर बार जब बारिश होती, जब नर्मदा किनारे ठंडी हवा चलती, या जब सफेद सलवार-सूट में कोई लड़की उसकी नज़र से गुजरती—उसे सृष्टि याद आ जाती
8. वर्षों बाद
समय बीत गया। आरव अब एक अध्यापक बन गया था। एक दिन स्कूल के गेट पर एक छोटी बच्ची आई, हाथ पकड़कर एक महिला उसे छोड़ने आई थी।
वो महिला कोई और नहीं, सृष्टि थी। उसके चेहरे पर समय की लकीरें थीं, पर आँखों की मासूमियत वही थी।
दोनों की नज़रें मिलीं। एक पल के लिए जैसे समय ठहर गया।
सृष्टि ने हल्की मुस्कान दी और कहा—
“आरव, ये मेरी बेटी है। मैंने उसका नाम रखा है—आरवी।”
आरव की आँखों में आँसू भर आए। वो समझ गया कि भले ही किस्मत ने उन्हें जुदा कर दिया, पर उनके दिल कभी अलग नहीं हो पाए।
✨ निष्कर्ष
पहला प्यार कभी भुलाया नहीं जा सकता। वो दिल में एक अधूरी किताब की तरह रहता है—जिसके कुछ पन्ने तो लिखे जाते हैं, लेकिन कुछ पन्ने हमेशा खाली रह जाते हैं।
आरव और सृष्टि की कहानी भी ऐसी ही थी—अधूरी मगर अमर।
क्योंकि पहला प्यार हमेशा पहला ही रहता है… चाहे मिल पाए या न मिल पाए।
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