सुहागरात एक नई शुरुआत
🌸 सुहागरात : एक नई शुरुआत
गाँव के बीचों-बीच सजाए गए बड़े आँगन में शहनाइयों की गूंज थी। हर ओर रोशनी, रंग-बिरंगे फूल और रिश्तेदारों की चहल-पहल। नृत्य और गीतों से माहौल और भी मधुर लग रहा था। उसी भीड़ के बीच दुल्हन बनी सुहानी लाल चुनरी में लिपटी, शर्म से झुकी हुई अपने कक्ष की ओर ले जाई गई। उसकी हथेलियों पर सजी मेहंदी अब तक गहरी हो चुकी थी, और पायल की रुनझुन जैसे उसके दिल की धड़कनों का संगीत बजा रही थी।
आज उसकी ज़िंदगी का सबसे महत्वपूर्ण दिन था — उसकी शादी और सुहागरात।
दूसरी ओर, दूल्हा आरव भी अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से मुश्किल से बचते हुए कमरे की ओर बढ़ा। वह भी भीतर से उतना ही घबराया हुआ था जितना सुहानी। भले ही आधुनिक शिक्षा और शहर में रहने के कारण वह खुले विचारों वाला था, परंतु इस अनोखे रिश्ते की पहली रात का भार उसके हृदय पर भी उतना ही था।
कमरे का दृश्य
कमरा फूलों और दीपों से सजाया गया था। छत से झूलते चमेली के गजरे और बिस्तर पर बिछी गुलाब की पंखुड़ियाँ कमरे को जैसे एक स्वप्नलोक बना रही थीं। हल्की पीली रोशनी, अगरबत्तियों की सुगंध और बाहर से आती शहनाई की धीमी धुन वातावरण को और भी कोमल बना रही थी।
सुहानी पलंग के एक कोने पर बैठी थी, सिर झुकाए, घूँघट में छिपी हुई। उसके कानों तक मेहमानों की हंसी और बच्चों की खिलखिलाहट पहुँच रही थी, पर मन तो जैसे घबराहट और नए जीवन की कल्पनाओं में उलझा हुआ था।
तभी धीरे से दरवाज़ा खुला और आरव अंदर आया। दोनों के बीच एक क्षण का सन्नाटा छा गया।
अनकहे भाव
आरव ने धीरे से दरवाज़ा बंद किया और कुछ क्षणों तक बस सुहानी को देखता रहा। उसके लिए यह दृश्य अद्भुत था—सजधजकर बैठी सुहानी मानो चाँदनी में नहाई कोई देवी हो। लेकिन आरव जानता था कि यह पल उसके लिए भी उतना ही नया और अनजान है।
वह धीरे से पास आया और बोला—
“सुहानी… घबराओ मत। आज से हम एक-दूसरे के साथी हैं, और इस रिश्ते को धीरे-धीरे समझेंगे।”
उसकी आवाज़ में आत्मीयता थी। सुहानी ने हल्के से सिर उठाया, उसकी आँखें घूँघट के भीतर से चमक रही थीं। होंठ हिले, पर शब्द बाहर नहीं निकले।
आरव ने मुस्कुराते हुए मेज़ पर रखा पानी का गिलास उठाया और उसकी ओर बढ़ाया।
“पहले थोड़ा पानी पी लो। आज दिनभर तुमने कितना कुछ सहा है—रिवाज़, रस्में, मेहमान।”
सुहानी ने काँपते हाथों से गिलास लिया। आरव ने उसी पल महसूस किया कि यह रिश्ता केवल प्रेम का ही नहीं, बल्कि विश्वास और संवेदनाओं का भी होगा।
संवादों की शुरुआत
धीरे-धीरे घबराहट का पर्दा हटने लगा। आरव ने उसकी पसंद-नापसंद पूछी, और सुहानी ने धीमे स्वर में उत्तर दिए। बातें छोटी थीं, लेकिन उन शब्दों में भविष्य की नींव छिपी थी।
“तुम्हें किताबें पढ़ना अच्छा लगता है?” आरव ने पूछा।
“हाँ,” सुहानी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “खासतौर पर कविताएँ।”
“तो ठीक है, कल ही मैं तुम्हें अपनी लाइब्रेरी दिखाऊँगा। वहाँ बहुत-सी कविताएँ रखी हैं।”
यह सुनकर सुहानी के चेहरे पर सच्ची मुस्कान आ गई। उसकी आँखों में चमक उभर आई। वह सोच रही थी—क्या सचमुच यह रिश्ता इतना सहज और मीठा हो सकता है?
पहला विश्वास
रात गहराती जा रही थी। बाहर आतिशबाज़ी की चमक दिख रही थी, पर कमरे के भीतर का वातावरण और भी शांत और मधुर होता जा रहा था।
आरव ने धीरे से कहा—
“सुहानी, मैं जानता हूँ कि शादी केवल एक रस्म नहीं होती। यह दो आत्माओं का मिलन है। लेकिन मैं चाहता हूँ कि हमारी शुरुआत विश्वास से हो, जल्दबाज़ी से नहीं। जब तुम सहज महसूस करो, तभी हम आगे बढ़ेंगे।”
सुहानी की आँखें भर आईं। उसने पहली बार साहस जुटाकर कहा—
“आरव… मैं भी यही चाहती हूँ। मुझे लगता है कि जीवन की असली खूबसूरती धीरे-धीरे समझने और अपनाने में है।”
यह सुनकर दोनों ने एक-दूसरे की ओर देखा। उस नज़र में न कोई लालच था, न कोई डर—बस विश्वास और अपनापन।
छोटे-छोटे पल
उस रात उन्होंने घंटों बातें कीं। बचपन की यादें, पढ़ाई के किस्से, सपने और भविष्य की योजनाएँ। दोनों ने महसूस किया कि असल सुहागरात केवल शारीरिक मिलन नहीं, बल्कि आत्माओं और दिलों का जुड़ना है।
कभी-कभी हल्की हँसी, कभी गहरी गंभीरता—उनकी बातें ऐसे बह रही थीं जैसे कोई नदी शांत लहरों में।
सुहानी ने अपने पिता की कही एक बात याद दिलाई—
“पापा हमेशा कहते थे कि शादी का रिश्ता उस पौधे की तरह है जिसे हर दिन पानी और देखभाल चाहिए। आज समझ में आ रहा है कि वह कितना सही कहते थे।”
आरव ने उसका हाथ पकड़ते हुए कहा—
“तो चलो, हम दोनों उस पौधे को मिलकर सींचेंगे।”
रात का समापन
धीरे-धीरे थकान ने उन्हें घेर लिया। बाहर से आती शहनाई अब धीमी पड़ चुकी थी। कमरे में केवल दीपकों की हल्की रोशनी थी।
सुहानी ने घूँघट उतारकर बगल में रख दिया। यह उसकी ओर से पहला विश्वास था। आरव ने उसे सम्मान और स्नेह से देखा। दोनों ने एक-दूसरे का हाथ थामे हुए रात की शांति में आँखें मूँद लीं।
वह रात केवल शारीरिक समीपता की नहीं, बल्कि दिलों की गहराई में उतरने वाली बातचीत की रात बनी।
अगली सुबह
सुबह की पहली किरण कमरे में आई तो दोनों ने मुस्कुराते हुए एक-दूसरे को देखा। उनके चेहरों पर कोई झिझक नहीं थी, केवल अपनापन और आश्वासन था।
सुहानी ने कहा—
“मुझे लगता है हमारी असली सुहागरात तो कल रात की बातें ही थीं।”
आरव ने हँसते हुए कहा—
“हाँ, क्योंकि हमने शुरुआत दोस्तों की तरह की, और यही दोस्ती हमें जीवन भर साथ ले जाएगी।”
🌹 निष्कर्ष
सुहागरात केवल एक रात का नाम नहीं है। यह जीवन के नए अध्याय की शुरुआत है, जहाँ दो अनजान आत्माएँ एक-दूसरे को जानने और समझने का अवसर पाती हैं। विश्वास, संवाद, अपनापन और सच्चाई ही उस रिश्ते को मजबूत बनाते हैं।
आरव और सुहानी की कहानी यही सिखाती है कि रिश्ते की असली नींव धीरे-धीरे बोए गए बीज की तरह होती है, जो समय और देखभाल से ही एक विशाल वृक्ष बनते हैं।
Aklesh Kakodia

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